शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

शादी की गुदगुदी

मै जो कह रहा हु वो एकदम सच है ये मै शर्त लगा कर कह सकता हु.आप इससे लाख इंकार करें पर आप ख़ुद जानते हैं की मै सच कह रहा हु...ये सच आपको इसलिए नागवार लग सकता है क्योकि इसे आपने कभी स्वीकार नही किया ..न ही अपने घनिष्ट रिश्तेदारों के सामने..न ही अपने उन मित्रो के सामने जो आपके मांसाहारी चुटकुलों का लुत्फ़ उठाते हैं ..और वो सच ये है कि शादी का ज़िक्र आते ही हमारे मन- मस्तिष्क में कुछ अच्छे वाले neurotransmitters दौड़ने लगते हैं ..हालाँकि ये अलग बात है कि शादी का ज़िक्र आते ही हमारी आम प्रतिक्रिया यही होती है ..कि शादी !!और मै?? कभी नही या "शादी करके मरना है क्या"..या फ़िर "मै आजाद रहना चाहता हूँ" या फ़िर "फिलहाल मै सिर्फ़ अपने करियर पर ध्यान दे रहा/रही हूँ." पर सच्चाई यही है कि शादी कि चर्चा सुनते ही एक बार मज़ा तो आता है...और उसके निम्न कारन होते हैं/ हो सकते हैं.१) शादी कि चर्चा हमे इस बात का अहसास दिलाती है कि अब हम जवान हो चुके हैं और अब हमे विपरीत लिंग के जन्तुओ के बारे में सोचने की लीगल परमीशन मिल गई है .२) शादी का ज़िक्र हमे जिम्मेदार होने और/या अपने पैरो पर खड़े होने का गर्व दिलाती है ३)शादी का ज़िक्र हमे ये अहसास कराती है की हम अब किसी लायक हो गए हैं और अपनी भी कोई औकात है वरना कोई मेरे लिए रिश्ता लेकर क्यो आता ??४) अब तक लड़का हर सुंदर लड़की के लिए अपने classmates/seniors से competetion हार चुका होता है या लड़की द्वारा रिजेक्ट किया जा चुका होता है. लड़कियों के मामले में कह सकते है कि अब तक कॉलेज के सब अच्छे seniors बुक हो चुके होते हैं और क्लास के गिने चुने अच्छे लड़को के साथ उनकी बेस्ट फ्रेंड घूम रही होती है..अतः शादी से ज्यादा ईजी गोइंग चीज़ क्या हो सकती है .....मेरे अन्दर पहले तीनो ही अहसास तब ही जाग उठे थे जब मै mbbs के 1st yr में था..(राजस्थानी जल्दी जवान होते हैं....) वजह भी थी..वो ये की मेरे aiims में चयन होने की न्यूज़ ग्रामीण स्तर पर आग की तरह फ़ैल रही थी और कम पढ़ी लिखी लड़कियों के वालिद मुझे जल्दी से जल्दी बुक कर लेना चाहते थे ..बहरहाल उस वक्त क्योकि उम्र कम थी और डाक्टर बन्ने की कठिन चढाई लम्बी थी इसलिए उस अहसास का लुत्फ़ मुझे मेरे अन्दर के conflict ने लेने नही दिया ( किसी को पता हो न हो मुझे तो पता था की जिस डाक्टरी के नाम से लोग खिचे चले आ रहे हैं वो अभी भी दूभर सपना है) ...internship आते आते मुझे lisence मिल चुका था कि अब मै बिना किसी guilt के शादी कि चर्चो का हिस्सा बन सकता था ...साथ ही ये भी जान चुका था कि pulse में जिन लड़कियों के साथ सुबह 5 बजे तक घुमते रहे वो अगली पल्स में कभी नही आती ..(बुहुहुहू ) ..तो भाइयो और सहेलियों!! एक दिन घर यानि जयपुर से फ़ोन आया कि फलां डाक्टर कि लड़की के लिए तेरे बारे में बात हो रही है ..हो सकता है कि आजकल में तेरे रूम पर कुछ लोग आयें ..( आओ भाई आओ मै तो कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था)...मैंने वैसा ही reaction दिया जैसे आप लोग देते हैं "मै नही मिलूँगा किसी से ..लोगो को कोई काम धाम तो है नही..शादी शादी करते हैं " .
लड़के के कॉलेज हॉस्टल में लड़के को देखने के कई उद्देश्य होते हैं जैसे १)लड़का कद में छोटा तो नही है। २) लड़का सही में डाक्टर है भी या नही ३) लड़के को premedication दिया जा सके ।
अगले ही दिन सुबह मैंने पहली बार इस बात पर ध्यान दिया कि मेरे पास aftershave नही है और razor भी बदलना है ....और deo तो कबका ख़तम हुआ पड़ा है...10 baje करीब फोन भी आ गया potential ससुराल वालो का ...करीब तीन महीने बाद आज मैंने अपने हॉस्टल के रूम में झाडू लगाने का मन बना लिया..भाई बात शादी कि नही है..कोई भी गेस्ट आए तो रूम साफ होना ही चाहिए( अपने आप को समझा रहा था पर अपने आपको मामू कौन बना पाया है).. कराटे कि costume भी आज अन्दर नही रखी...लड़की तक ये मेसेज जाना तो चाहिए कि लड़के कि बॉडी एकदम फिट है ...फ़िर तुंरत अपने बेड पर गद्दे के नीचे रखी मस्तराम सीरीज़ कि सारी किताबें पड़ोसी को किराये पर दे आया ..क्या पता कब किसी का हाथ फिसल जाए ...११ बजे लड़की वालो का flying squad आ गया .दरवाज़ा बजते ही मुझे मालूम था कि वही लोग हैं पर ..भाव तो खाने ही थे..आखिर बरसो तक इंतज़ार किया...इसलिए अनजान बनके पुछा" हाँ जी ..किस्से मिलना है?" ..खैर छोटे से परिचय के बाद वो लोग अन्दर आए ....और आकर २ मिनट तक मौन हो गए..बात कैसे शुरू करें दोनों तरफ़ यही सोच विचार चल रहा था ..फ़िर जैसा कि अक्सर होता है ..एकदम फिजूल कि बातो से बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा ..कितने students हैं बैच में .अपने इलाके के कितने लड़के हैं ...दिल्ली में गर्मी काफी पड़ती है...लगता है इसबार तो कांग्रेस ही आएगी...मोटर साइकिल तो हीरो होंडा कि ही बढ़िया होती हैं वगैरा वगैरा ...फ़िर २ मिनट का मौन.."हाँ जी..तो आपकी पढ़ाई तो पूरी हो ही चुकी..अब आगे का क्या प्लान है..कहाँ सेटल होने का है " ...मै एकदम अरस्तु बन गया..एकदम कांग्रस के प्रवक्ता कि तरह बोलने लगा " देखिये डाक्टरों कि पढ़ाई तो उम्र भर चलती रहती है ....पीजी को करनी ही पड़ेगी ...सेटल तो वहीँ हो जाएँगे जहाँ करियर जम जाए ..."ह्म्म्म्म... किस ब्रांच में करेंगे पीजी "...."देखिये अब कोई चोइस तो होती नही है आजकल /.जो मिल जाए वही सही..." ह्म्म्म्म....( अबे जल्दी रास्ते पर आजा...क्या हूँ हूँ किए जा रहा है )..आपकी बहन भी डॉक्टर है न..कहाँ है? SMS में है??( अबे बहन को छोड़ ..उनकी शादी हुए तो ६ साल हो गए..बहन के भाई कि बात कर )....तो फ़िर....कुछ सोचा है शादी के बारे में ..( वाह वाह)..हेहेहेहे ...शादी के बारे में तो फिलहाल ...ऐसा कुछ सोचा नही ..कभी टाइम ही नही मिला ...फ़िर भी...अब तो ...भाई ऐसा है न हर चीज़ कि एक उम्र होती है ...हर काम सही उम्र में हो जाए तो ही अच्हा है............(क्या कहूं ?)....हाँ बात तो...ठीक ही है....मगर..हमारी बच्ची है...डेंटल में कर रही है ...आपके पापा से भी बात हुई...उन्होंने कहा कि जो भी पूछना है पार्थ से ही पूछना .....अब वो भी सेटल हो ही जाएगी... आप भी चाहते होंगे कि इसी लाइन कि कोई लड़की हो..है कि नही ..?( इन बातो का आपस में कोई लिंक है?? पर हाँ है...बिल्कुल है..बल्कि ये कहूं कि अब तक कि बातचीत में सबसे relevent बात ही यही है )आप लोग घरवालो से ही बात करें..मै तो अब हेहेहेहे क्या ही कहूं ....वो तो करेंगे ही पर पहले आपसे बात कर लेते तो...,....( अबे न फोटो दिखाया न मोबाइल नम्बर . दिया और बात किए जा रहा है ..कुछ तो रोमांटिक होने दे )..अ ..वो....कहाँ से....किस कॉलेज में है ...( बस इनता ही निकल पाया ज़बान से )SMS में ही है..डेंटल....आप दोनों डाक्टर ..एकदम ठीक रहेगा ..( अबे जा...डाक्टर मत बोल उसे ..डेंटल को डेंटल ही रहने दे )....... ...वैसे तो हम लोगो कि प्लानिंग ये थी कि कोई पीजी वाले ...पर ठीक है ... AIIMS का अपना रुतबा है ...(साला!! ... ये क्या कह गया ...मुह का स्वाद खट्टा कर दिया..पीजी वाला ढूंढ रहे थे साली दंतालू के लिए ...मुझ पर अहसान कर रहे हैं ..aiims का लेबल देख कर ..जा नही करता! ..आज ही अभी रिजेक्ट किया !!..जहाँ इतने दिन अख़बार पर भड़ास निकली ..कुछ वक्त और सही..न फोटो चाहिए न मोबाइल नम्बर ...)उसके बाद मेरा मन बातो में लगा नही ..आगे क्या क्या बातें हुई,..ठीक से याद नही ...घरवालो से साफ़ कह दिया कि रूम पर कोई नही आना चाहिए ... महीनो बाद फ़िर पीजी में भी हो गया ...फ़िर उन लोगो ने कई बार फ़ोन पर बात कि...कई बिचौलिए भी भेजे ..पर मैंने भाव नही दिया ..क्योकि अब बहुत से लोग थे जो मेरे अच्छे वाले neurotransmittersकोदौडाने लगे थे ..क्योकि अब पीजी का लेबल भी लग गया था .

शनिवार, 16 अगस्त 2008

मनोरोग आउट डोर का एक आम दिन...

एक कठपुतली जैसी मुद्रा वाले एक रोगी के साथ दो जने डाक्टर के पास ( यानि मेरे पास )आते हैं॥

डॉ: हाँ जी बोलो ...

आदमी : मरीज़ भरती करना है ।

डॉ : पहले ये तो बताओ की परेशानी क्या है ॥सीधा भरती कर दू ?

आदमी : मेंटल है मरीज़ ॥

डॉ : ये तो अस्पताल ही मेंटल मरीजों का है ,तुम ये बताओ हुआ क्या है मरीज़ को ,फ़िर फ़ैसला करेंगे भरती का।

आदमी : दिमाग का मरीज़ है

डॉ : अरे भाई ..इस अस्पताल में केवल दिमाग के मरीजों का ही इलाज़ होता है ,तू ये बता तेरे मरीज़ को क्या हुआ है ..।

दूसरा आदमी : जी , मरीज़ हाफ माइंड हो गया है ॥

डॉ का पारा चढ़ने लगता है ...

डॉ :जब तूने इतना ही पता कर लिया की मरीज़ हाफ माइंड है तो इलाज़ भी तू ही लिख दे ....

आदमी भी झुंझला जाता है ।उसको समझ नही आ रहा की डॉ आखिर चाहता क्या है ..

आदमी : अजी इलाज़ मै ही लिख देता तो यहाँ क्यों आता...

डॉ : अबे यार तू किस भाषा में समझेगा ...मैंने ये नही पुछा की मरीज़ मेंटल है या डेंटल है ..मै ये पूछ रहा हु की मरीज़ को आखिर हुआ क्या है ,क्या लक्षण है क्या असामान्यता है , व्यवहार में क्या विसंगतियां है ...???...वो जाट थे शुद्ध हिन्दी तो वो अंग्रेज़ी से भी कम समझते थे

दूसरा आदमी : अजी हुआ तो ये ही है की मरीज़ का दिमाग out हो गया है

dr: @%$%$%$#^%#@$@#$#@$.... $%$%!@%%!@