मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

बेचारा शरीफ रावण

मै रावण  को जलते हुए नहीं देख सकता। इसीलिए या तो मई दशहरे को रावण -दहन देखने जाता ही नहीं या फिर जाता भी हूँ तो चाट-पकोड़ी खाकर दहन से पहले ही वापस आ जाता हूँ। इसके तीन कारण हैं . पहला तो ये कि  आज के सामाजिक परिपेक्ष्य में देखा जाए तो रावन ने ऐसा कोई कोई काम नहीं किया कि उसको हजारो साल तक गालियाँ दी जाएँ। अपहरण के ऐसे मामले बहुत ही आम हैं और धारा  354 के अंतर्गत 2-3 साल की सजा काट कर आदमी बहार आ जाता है ..कोई बड़ा मुद्दा नहीं। कम से कम ऐसा मुद्दा तो नहीं कि 4-5 हज़ार साल तक याद किया जा सके।दूसरी बात ..और इस बात को मै  सबसे ज्यादा वज़न देता हूँ ..वो ये कि रावण जैसा बेहतरीन प्रशासक और शासक हिंदुस्तान में तो कोई नहीं हुआ ..राम भी नहीं ..कल्पना कीजिये एक ऐसे राजा  की जिसका राज्य छोटा सा हो फिर भी इतना शक्तिशाली कि हजारो मील दूर भी लोग उससे थर-थर कांपे। इतना समृद्ध और खुशहाल हो कि वहां के निवासी अपने घर पर चूने का  पलस्तर करने की बजाये सोने की परत चढ़ा दें। कोई भाई-भतीजा वाद नहीं।।महिलाओं को अग्नि-परीक्षा देने का कोई प्रावधान नहीं . निःसंदेह इतना बेहतर राज-काज कि स्वयं राम ने मरणासन्न रावण से हाथ जोड़कर public administration की क्लास लेने की गुज़ारिश की।तीसरी बात ये कि रावण को जलता हुआ देखने आई भीड़ में अधिकांश लोग रावण  से ज्यादा पापी हैं। बल्कि ये कहना चाहिए कि 99% राजनेता, पुलिस वाले,आईएस अधिकारी , न्यायधीश रावण से कहीं ज्यादा रावण हैं ..रावण ने ऐसे कोई काम नहीं किये जैसे ये लोग करते हैं .और आखिरी बात ये कि रावण कि औकात ही ख़तम कर दी लोगो ने ..पहले पूरे शहर में एक रावण  जलता था अब हर घर का पर्सनल रावण होता है ..लोग स्कूटर और कार में बाँध कर रावन घर ले जा रहे हैं।फुटपाथ पे रावन ऐसे बिकने लगे हैं जैसे चाइनीस घडी या कैलकुलेटर ..हर भले आदमी की तरह रावण ..तेरे भी बुरे दिन आ गए